श्री बाबा गणिनाथ लीला प्रारंभ
आज से हजारो वर्ष पहले की बात है। पृथ्वी पर घोर अन्नाईयों का घोर पाप होने लगा तो पृथ्वी गौ का रूप धारण कर ब्रह्मलोक को गई तब ब्रहमा जी बोले, हे पृथ्वी, मैं आपके दुःखो से अति दुःखी हुआ पर में इसमें क्या कर सकता हूँ अतः आप हमारे साथ विश्णुलोक चले वहीं पर कोई निराकरन होगा तब गौ माता और श्री ब्रह्मा जी विश्णु भगवान के पास पहुॅचे और अपना दुखरा सुनाए तब विष्णु भगवान वोले ठीक है। हम लोगों को कैलाश पर्वत पर शिवजी के पास चलना होगा जहां हम सबों का कल्याण होगा अब आगे-आगे गौ माता और उनके पीछे ब्रह्मा जी एवं विश्णु भगवान शिवलोक को प्रस्थान किए जब सभी लोग शिवलोक पहुँचे तो श्री शंकर भगवान सभी लोगों को प्रणाम कर अपने आशन पर बिवाया तब गौ माता अपनी सारी कहानी कहने लगी। हे त्रिपुरारी देवों में देव महादेव आप तो सब कुछ जानते हैं आप से छूपा हुआ इस चरती पर नहीं है फिर भी मैं अपनी
दूखरा आप को सुनाती हूँ है महा देव अब धरती पर नहीं है। फिर भी अपनी दूखरा आप को सुनाती हूँ। हे महादेव अब धरती
वको
पर इतना पाप बढ़ गया है की वहाँ पर रहना हमारे बस की बात नहीं है। यहां हम मेरे तुल्य अपना जिवन बिता रही हूँ।
अतः हे महादेव हम धरती वासियों के कल्याण का कोई उपाए करें तब श्री शिवजी बोल है जग जननी जगत का पालन
करने वाली गौ माता आप इतना निराश होने कि कोई आवश्यकता नहीं, एक समय आयेगा जब हम धरती वासियों के कल्याण के
लिए मैं स्वयं अपना रूप परिवर्तित कर मृत भूवन में आऊँगा और आप सबों का कल्याण होगा।
आप ब्रह्मा, विश्णु, महेश एवं सी माता का वहाँ से प्रस्थान करना। अब श्री शंकर भगवान अपने मन में विचार किए और चले माँ पार्वती के पास अपने मन की बात बताने को अब जगत जननी आदि शक्ति माँ भवानी तो सब कुछ जानती थी फिर भी श्री शिवजी से पूछे हे नाथ आज कोई विशेश बात हो तो बतायें आज आप बहुत गम्भीर हैं। श्री शिवाजी बोले नहीं कोई खास बात नहीं अब गां पार्वती श्री शंकर जी से किलौल करते हुए अति प्रेमपूर्वक पूछती है की हे नाथ आप देवों में महान है क्या बिना स्त्री-पुरुश के सम्पर्क से कोई सतान कि उत्पती हो सकती है तब श्री शकर भगवान मुस्कुरा दिए और अपने मन में सोचे कि पार्वती की भी इच्छा है कि धरती की रक्षा हो तथा शिवजी बोलते हैं। है पार्वती समय आने पर आपकी इच्छा पूर्ति होगी।
अब धीरे-धीरे समय बितने लगा और आ गया वो समय जिसका इन्तजार मृत भूवन के हर प्राप्ति को था अब इधर मा
पार्वती श्री शंकर भगवान की अराधना में अपने आंचल को फैलाए एवं अपने नेत्र को बंद कर पूजा कर रही थी उसी समय श्री शंकर
भगवान यहां प्रकट हुए मां पार्वती के आंचल में यहां जल रही होग गंध धूप उता उनके आंचल में डाल दिए और पार्वती से आंख
खोलने को कहे जब पार्वती आंखें खोलती है तो अपने आंचल में एक बहुत ही सुन्दर बालक को देख अति हर्शित हुए नाम कि
ओर देखती हैं। शंकर भगवान मुस्कुराकर कहने लगे हे पार्वती सुमने मुझसे जो प्रश्न की उसका उत्तर तुम्हें मिल गया अब इसको
देख भाल तुम करो तब मां पार्वती श्री शंकर भगवान से बोले है नाथ आप तो अपने कर्तव्य का पालन किए अब मेरी बाड़ी है उसके
बाद माता पार्वती ने अपने शक्ति से एक कन्या को प्रकट किए और उस कन्या को मृत भूवन में भेजने का इन्तजाम शुरू हुआ उस
समय सभी देवगण वहां उपस्थित हो पूरूपों की वरसान की और सभी के विचार से उस कन्या को विमान द्वारा पलवैया से उत्तर की
और एक जंगल में गायावी खरहउर के बन में उस कन्या को उतार दिया गया और सभी लोग वहाँ से विदा लिए।
सब रचना तो नारायण का रचा हुआ था और उसी समय मान साह नाम का एक किसान खड़हतर काटने के लिए उस जंगल में आया और अती सुन्दर खर देख काटने को बैठा ज्योंही उसने खर काटना शुरू किया तो एक कन्या को यहाँ रोते पाया मान साह को देख वह कन्या रोते-रोते चूप हो गई। तब मान साह उस बच्ची को आपको गोद में उठा अपने सीने से लगा लिए। उस समय उनकी प्रसन्नता की कोई सिमा न था और उन्होंने अपने आप को भूला दिया कि हम निःसतान है क्योंकि मान साह को कोई संतान नहीं था सो उस बच्ची का स्पर्श
उन्हें सस्नेह रोमांचित कर दिया और कुछ सोच उस बच्ची को अपने गमछे से झट छीपा लिए ताकी कोई इस बच्ची को हमसे जुदा मान साह, उस बच्ची को ले अपने घर की और चल पड़े घर पहुंचने पर उनकी पत्नी उस बच्ची को देख बढ़े हर्शित हो उसे अपने सिने से लगा लिया मान साह उस बच्ची के दावेदारों का बहुत खोज कएि मगर उसका दावेदार कोई व्यक्ति नहीं हो सका और उस बच्ची का पालन पोशण उनके यहाँ होने लगा। नोट- गंध धूप से उत्पती के कारण (गणिनाथ) नाम उस बच्चे को पड़ा और खरहउर से जो बच्ची मिला उसका नाम खेमा बेगता सती पड़ा)
न कर सके।
वो बालक रूपी गणिनाथ का पालन-पोशण वहा शिवलोक में और बच्ची रूपी क्षमा सती का मान साह के यहां होने लगा धीरे-धीरे कुछ समय बीता तो श्री शंकर जी उस बालक (गणिनाथ को) विश्णु लोक ले चले विश्णुलोक में भगवान नारायण ने उस बालक को देख अति प्रसन्न हुए और अपने पास ही रख लिए और उनका शिक्षा-दीक्षा एवं साधना वहां पर होने लगा। धीरे-धीरे कुछ समय बीता अब बालक गणिनाथ का उम्र 14 वर्श बीता तो एक रोज श्री शंकर भगवान विष्णु लोक पहुंचे और विश्णु भगवान से मिलने के उपरान्त बालक गणिनाथ को बोले हे वत्स अब तुम्हें मृत्युलोक में जा धरती वासियों के कल्याणार्थ
काम करने हैं।
अतः वहां चलने की तैयारी करो। अब बालक गणिनाथ की विदाई के लिए सभी देवगण वहां उपस्थित हो गए अब बालक
गणिनाथ जब विश्णु भगवान का चरण स्पर्श कर उठा तो उनके दोनों आंखो से आशा की यून्द टपकने को है तो विश्णु भगवान
से
उस को बालक सस्नेह पूर्वक पूछा बोलो वत्स क्या कात है। तब बालक रूपी गणिनाथ ने कहा है प्रभु हे करुणा निधान मुझे
आपकी सेवा से कहीं और जाने का इच्छा नहीं करता तो श्री भगवान बोले हे गणिनाथ तुम मृत्यु लोक में पहले जाकर अतिताईयों
के विनाश के लिए शिर्जण करना होगा और उसके बाद हम तुम्हारे पुत्र के रूप में गोबिन्दा अवतर लूँगा और सारे इश्ट जनों से
धरती वासियों को उद्धार करूँगा।
अतः मेरी भी यही इच्छा है। इतना कह सभी लोग उस बालक को विमान पर चढ़ाने चले तो वह बालक श्री शंकर भगवान
से पूछा है पिता प्रमेश्वर मृत्यु भूवन में तो वर्ण भेद है तो मैं यहाँ कौन वर्ण कहलाऊँगा है कृपा सिन्धू शंका समाधान करे तब श्री शंकर जी बोले जो मनुश्य आपको मृत्युलोक में प्रथम मिलेगा वही जाति और वर्ण आपका होगा। अब विमान मृत्यु भूवन में एक बहुत ही भयानक जंगल में गणनाथ को उतार दिया। अब गणिनाथ उस जंगल में धीरे-धीरे चलते हुए एक पीपल के नीचे का बैठ और प्रकृति की अनुपम धरा को देखने लगे उस जंगल में मन को मोहने वाले वृक्ष थे कहीं खैर तो कहीं चन्दन तो कहीं हुमार कुल मिलाकर सभी तरह के फल-फूल वाले इस जंगल का नाम पलवैया जंगल के नाम से जाना जाता था। जो साढ़े बारह सौ बीघे की रकवा में नदी किनारे तक फैली हुई थी।
अब धीरे-धीरे सूर्य भगवान की लालीमा भरती पर अमृत की धारा बिखेरने लगी उसी समय वहाँ एक बूढा व्यक्ति आया
और पीपल वृक्ष के नीचे बैठे सन्त रूपी गणिनाथ को दन्डवत प्रणाम किये तो सन्त रूपी गणिनाथ उस बूढ़े व्यक्ति से पूछा ए भाई
आप किस वर्ण के हो तो वह बूढ़ा व्यक्ति बोला है सन्त हम वैश्य जाति के है अतः अपना प्रेरणा दे तो गणिनाथ जी बोले में भी वैश्य
जाती का हूँ।
अतः गणिनाथ उस बूढ़े व्यक्ति से उसका नाम एवं इस घने जंगल में आने का कारण पूछा जिसके हाथों में एक कुल्हारी था सो बोला मेरा नाम मान साह है और मैं इस जंगल से रोज लकड़ियाँ काटता हूँ और इससे मेरे परिवार का गुजारा होता है। किन्तु आपका दर्शन प्राप्त कर कहीं जाने को मन नहीं करता। अतः मेरे साथ मेरे अतिथ्य स्वीकार कर हमें अनुगुहीत करें। मूलक नाथ
तब गणिनाथ जी बोले है भाई हम तुम्हारे साथ अवय चलेंगे अतः तुम लकलिया काट लो। वह बूढ़ा व्यक्ति लकड़ी काटने
लगा थोड़ी सी लकड़ियां काटते-काटते थक गया और वह बैठ गया तब गणिनाथ जी बोले हे भाई तुमने तो आज थोड़ी-सी ही
लकड़ियां काटे हो अतः थोड़ी-सी और काट लो तो वो बूढ़ा व्यक्ति बोला है सन्त अगर ज्यादा काट लूँ तो भी मैं इसे उठा नहीं
सकता लकड़ियां मेरे पास कोई शक्ति नहीं है। अव अब हमलोग चलें तो गणिनाथ जी बोले तुम्हारा गुजरा लकड़ियों से ही होता है और आज मैं भी तुम्हारे साथ हूँ। अत: पबहाओं नहीं और थोड़ी लकड़ी काटों वह बूढा व्यक्ति लकड़ी काटने को उठा तो उसके शरीर में एक प्रकार का शक्ति का संचार हुआ और वह लकड़ियां काटने लगा थोड़े ही देर में लकड़ियों का बहुत सा ढेर लग गया जब मान साहयों लकड़ियों का ढेर देखा तो चकित हो श्री सन्त की ओर देखने लगा। तब सन्त जी बोले है भाई अब सारी लकड़ियों को एक जगह रस्सा तैयार कर बाघों मान साह रस्सा तैयार हो गया। और सारी लकड़ियों को दो बूढ़ा व्यक्ति क्षण भर में ही श्री सन्त की कृपा से उसे रस्सा पर डाल दिया और पहाड़ जैसा बोझ को देख चिन्तित भाव से उसे अपलक देखने लगा तो सन्त रूपी गणिनाथ ने कहा है भाई तुम विशेश मत सोचो हम जैसा कहते हैं।
वैसा ही करते जाओ।
सन्त के आदेश से उस बूढ़ा व्यक्ति रस्से को इधर और उधर से फेंक दिया और बोझा बन्ध गया तब गणिनाथ जी अपनी चिमटा ले बोझा उठाने वास्ते उसके नजदिक पहुंचे और मान साह से बोले चलो माई उठाओ तो यह बूढा व्यक्ति घबड़ा कर एक दम पीछे हट कुछ सोचने लगा की कहीं कोई पागल सन्त तो नहीं है जो इतना बड़ा बोझा हम बूढ़ा और निर्बल को उठाने को बोल रहा है। तो सन्त रूपी गणिनाथ मुस्कुराते हुए बड़े ही प्रेम से बोले हे भाई आप बिलकुल मत सोचो मैं तुम्हारे साथ हूँ ऐसा कह अपने चमटे के सहारे से उस बोझ को उसके माथे पर डाल दिये देखो हमारे बाबा गणिनाथ की महिमा से उस बूढ़ा व्यक्ति पहाड़ जैसा
बोझ उठा चल पड़ा अब आगे-आगे मान साह एवं उनके पीछे श्री सन्त जी उस जंगल से प्रस्थान किए
अब धीरे-धीरे जंगल का रास्ता समाप्त हुआ और वह ग्राम के रास्ते में जा मिला गांव से थोड़ी दूर से ही ग्राम का नजारा
सन्त जी देखने लगे वहां गांव में लोग उस बोझे को देख धबड़ा कर इधर-उधर भाग दौर करने लगे आपस में वे लोग बात करते
भाग रहे थे कि कोई राक्षस दैत्य हमारे ग्राम में पहाड़ पटकने आ रहा है। तब सत रूपी गणिनाथ जी बोले है मान साह तुम्हारे ग्राम
के लोग तुम्हारे बोझ को देख अति घबढ़ाये हुए भाग दौर कर रहे हैं।
अतः आप अपने ग्राम ग्रामवासियों को आवाज दे कहाँ अपना परिचय दो तब मान साह कुछ दूरी से आवाज दे बोला है
हमारे ग्राम वासियों आप लोग घबढाईए नहीं मैं आप ही के ग्राम का मान साह हूँ जो लकड़ी का बोझ इतना बड़ा उठाए हूँ सो श्री
सन्त के कृपा से अतः आप लोग चिन्दा करें
अब मान साह अपने दरवाजे पर जा लकड़ी का गठ्ठर भूमि पर डाल सोचने लगा आज हमारे दरवाजे पर एक सत आए है ऐसा विचार का श्री संत से बोले हे महाराज आप थोड़ी देर वहां विश्राम करे हम बाजार जा लकड़ी बेच आपके लिए और अपने परिवार के लिए खाद सामाग्री ले कर आता हूँ तब गणिनाथ जी बोले हे मान साह आप हमारे पास बैठो। तो मान साह बाबा के नजदीक बैठ गया श्री संत जी मान साह से पूछते हैं। एभाई आप हमारे प्रश्न का उत्तर दो इतना कह उस मुढे व्यक्ति से पूछे हे भाई आप अपने ग्राम वासियों को कोई भोज निमंत्रण में पन्चत कराए हो या नहीं तो उस बूढ़ा व्यक्ति बोला हे संत हम गरीब आदमी आजतक अपने ग्राम वासियों को नहीं खिलाया उन लोगों के यहां हम आवश्य खाये हैं तो गणिनाथ
जी बोले है भाई तब तो हम तुम्हारे यहाँ पन्धत नहीं कर सकते जब तक तुम अपने ग्रामवासियों को नहीं पन्धत कराओगे तबतक
हम तुम्हारे दरवाजे पर पन्धत नहीं करेंगे।
तब मान साह सोचने लगा हे प्रभु आप की गाया भी क्या क्या नहीं कराती जो व्यक्ति को स्वयं अपने खाने के लिए दानादाना नहीं हो वा व्यक्ति दूसरे को कहा से और कैसे खिलाएगा आज हमारे दरवाजे पर एक सन्त भी आ थे और भूखा
चला गया तो यह जीवन व्यर्थ ही होगा। ऐसा प्रश्न हमारे साथ ये सन्त महारज का है जो हम पूरा नहीं कर सकते है
प्रभू मैं क्या करूँ तब गणिनाथ जी उसे चिन्तित देख अति स्नेह पूर्वक बोले हे भाई आप चिन्ता मत करो और हम जैसा अतः हे मान साह हमारी बात ध्यान से सुनो तुम अपने ग्राम वासियों को जा निमंत्रण करो और कहो कि हमारे दरवाजे पर एक सन्त महाराज आए हैं। तो भण्डारा होने वाला है। अतः आप सभी लोगों को हमारे यहाँ का पन्धत निमंत्रण है और वो सारे ग्रामवासियों को नेवता देने लगा तो मन साह को उल्टा पुल्टा भी कहा की खुद खाने को एक दाने नहीं चले हैं सारे गाँव को खिलाने, कहीं यह बूढ़ा पागल तो नहीं हो गया है। व
कहते जायें वैसा करते जाओ ज्यादा कुछ गत साँचो
से सुना और उड़न्ड बच्चों को समझाया तुम लोग इस गरीब आदमी को भला बुरा कहने के बजाए इसके दरवाजे पर चलकर देखें तो सही कि क्या बात है अगर खिलायेगा तो भी और नहीं भी खिलायेगा तो कम से कम सन्त दर्शन तो होगा ही ऐसा विचार कर उनलोगों ने उसके निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। अब ग्रामवासियों को निमंत्रण कर मान साह बाबा गणिनाथ के नजदीक चले आए तब गणिनाथ जो मान साह से बोले है मान साह अब आप कुम्हार के पास जाओं और एक हाड़ी और एक ढक्कन मांग लेना और ग्वाले भाई से उसमें थोड़ा दूध मांग लेना
मगर कुछ वृद्ध लोग उनकी बातों को ध्यान
और बोलना हमारे दरवाजे पर एक सन्त आए हैं। जो भंडारा होगा जितना दुध बो दे लेकर जल्दी आओ।
अब मान साह श्री सन्त कृपा से उनका आदेश पर कुम्हार के पास चले जब कुम्हार के दरवाजे पर जा उससे बोला है। भाई कुम्हार मुझे एक बर्त्तन दो हमारे दरवाजे पर एक सन्त आए हैं सो भण्डारा होगा पर कुम्हार के पास बर्त्तन था मगर वह देने से इन्कार कर दिया तब मान साह मन में विचार कर ग्वाले भाई के पास गया और उससे बोला हे प्रभु हमारे दरवाजे पर एक संत आए हैं। सो भण्डारा होगा। पर कुम्हार के पास बर्तन था मगर वह देने से इन्कार कर दिया तब मान साह मन में विचार कर ग्वाले भाई के पास गया और उससे बोला है प्रभु हमारे दरवाजे पर एक संत आए है। सो महारा होगा। अतः हमे थोड़ा सा दूध दे ग्वाला भाई के पास कुछ दूध दूहा था और कुछ गौएँ दूहने के लिए बचा था मगर उसने मान साह से झूठ बोल गया उसने कहा हमको आज गौऐ दूध दुहने ही नहीं देती हम दूध कहां से दूँ। अब मान साह दूःखी हो ग्वाले और
से
कुम्हार के दरवाजे से लौट गया।
जब मानसाह को खाली हाँथ लौटा देख गणिनाथ जी अपने नजदीक बैठने को कहा अब उधन कुम्हार का सब पका हुआ बर्तन कच्चा हो गया और ग्वाले भाई का सारा दुध फट गया जो गाए नहीं दुहाई थी सो अब दुहने ही नहीं देती अब ग्वाले भाई और कुम्हार दोनों दौड़ा मान साह के दरवाजे पर आया जब संत महाराज पर उसका नजर गया तो वे दोनों श्री संत के चरणों से लगे अपने किए का क्षमा मांगने लगा। तब गणिनाथ जी उन दोनों को क्षमा कर आदेश किए जाओ और अपने-अपने घरों से सामान ले कर जल्दी से आओ कुम्हार एवं ग्वाले भाई दौस चले अपने घर की और जब घर में कुम्हार प्रवेश किया तो बाबा की चमत्कार देख
बड़े ही हर्शित हो एक सुन्दर बर्तन ले मान साह के दरवाजे पर पहुँचा। अब मान साह के दरवाजे पर धीरे-धीरे लोगों का भीड़ बढ़ गया सबतक ग्वाले भाई दूध लेकर नहीं लौटा था तभी उस भीड़ से एक नौजावन जो गाय चराने वाला था सो एक कुमारी बछीया की ओर इशरा कर गणिनाथ जी से बोला अभी दुध आने में देर है। इ बछीया को दूह लीजिए उसकी बातों को सून सभी लोग हसने लगे तब बाबा गणिनाथ जी एक नजर उस बच्चे को देख
गुस्कुरा दिये और बोले हे बालक तुम्हारी इच्छा है कि कुमार बछीया दुध दे तो अवय यो दुध देगी। इतना कह ने एक हाथ उठा
बछीया की ओर संकेत किए तत्क्षण बछीया वहां दौड़ी चली आई।
तब गणिनाथ जो मान साह से बोले सवा हाथ धरती गंगा जल से निपने को कहा मान साह वो जगह नीप कुम्हार का दिया
बर्तन उस जगह रख दिया अब बछीया उस बर्त्तन के नजदीक आ खड़ी हो गई और उसके थन से दूध की धारा चल पड़ी और यो उस बालक को क्षमा कर गणिनाथ जो अग्नि प्रज्वलित कर बर्तन चढ़ा दिये और गान साह से बाले हे माई अपने घर में जा अपने कन्या से चावल और सक्कर मांग कर लाओ ऐसा प्रश्न सुन मान साह मन ही मन सोच घबड़ा गया क्योंकि उत्तके घर में एक दाना नहीं था और सन्त का आदेश था चावल और सक्कर लाने को अतः वह कुछ सोचने लगा सब गणिनाथ जो बोले है भाई तुम बेकार की चिन्ता मत करो और जैसा मैं कहता हूँ वैसा करते जाओ अपने पुत्री से चावल सक्कर मांग जल्द लाओ तब मान साह अपने पुत्री क्षेमा सती को आवाज दे कहता है। हे पुत्री अपने दरवाजे पर जो सन्त आए हैं उनकी आज्ञा है। अपने घर से चावल और सक्कर लाने को तब क्षमा शती अपने घर में प्रवेश कर देखती है सारा सामान घर के अन्दर भरा पड़ा है। वो देख क्षमा सती समझ
काम घेतू हो गई।
जाती है कि हमारे नाथ का आगमन हो गया है।
अतः बड़े हर्शित हो एक बर्तन में थोड़ा चावल एवं सक्कर ले दरवाजे पर अपने पिता को दे देती है। अब संत रूपी गणिनाथ जी उस चावल से अढ़ाई मूती चावल बर्तन में डाल देते हैं और भन्डार बनाना शुरू हो जाता है। अब धीरे-धीरे सारे ग्राम के आमंत्रित लोग मान साह के दरवाजे पर इक्ता होने लगे। तब गणिनाथ जी सभी ग्रामवासियों से पंक्ति होकर बैठने को कहा सभी लोग लाईन से बैठ गए तो गणिनाथ जी मान साह को आज्ञा किए जाओ सभी के सामने पल बालो फिर क्या था बाबा की महीमा जान दी अपने घर में जा लोगों के सामने पत्तल डाल दिया तब गणिनाथ जी प्रसार में तुलसी छोड़ आदे" किए। सभी लोगों को एक-एक एक्कन प्रसाद देते चले जाओ। •मान साह वैसा ही करता गया देखिए श्री बाबा की महीमा सारे के सारे लोग प्रसाद खा चुके पर प्रसाद ज्यों की त्यों बचा
रह गया जो जितना खाने वाले थे एक ही ढक्कन में सबो का पेट भर गया और सभी लोग श्री बाबा का गुणगान करते हुए
अपने-अपने घरो को गए सभी को प्रसाद देने की उपरान्त बाबा वहां पन्चत किए और बाकी का बचा प्रसाद की धरती मां को सुपुर्द कर दिया गया। नोट: आज वही प्रसाद को हम लोग अडईया महा प्रसाद के नाम से जानते हैं जो केवल गौ के दूध में बनता है। अब मान साह एवं उनकी पत्नी दोनों ने आपस में विचार किया क्यों न हम अपनी कन्या का विवाह इस माहपुरूश से कर
दें क्योंकि क्षेमा सती के लिए इससे अच्छा लड़का और कहीं मिलेगा ऐसा बिचार कर पति-पत्नी सुबह सुबह श्री सन्त के नजदीक
जा कर बध प्रार्थना कर कहने लगे हे संत महाराज कोई सन्त महात्ना किसी के दरवाजे पर जाते है तो यथा शक्ति लोग अपने
क्षमता के अनुसार कुछ दान करते है। अतः मैं भी आपको कुछ दान करना चाहता हूँ।
तो गणिनाथ जी बोले हे मान साह हम आप लोगों की सेवा से अति प्रसन्न हूँ फिर तुम एक गरीब व्यक्ति भला क्या दान
करोगे तो मान साह अपनी पुत्री क्षमा सती को सामने ला बोला हे महाराज मैं इस कन्या को जंगल में पाया था। जिसे बढ़े ही स्नेह
से अपनी सन्तान की तरह पाला हूँ।
अतः इससे विवाह कर इसे स्वीकार करे एवं हम गरीब का उद्वार करे तब गणिनाथ जी बोले हे मान साह मैं तो एक संत हूँ
और संत को विवाह के झनझट में नहीं पड़ना चाहिए अतः आप लोग ऐसा विचार त्याग दें परन्तु मान साह बोला हे संत मेरे कन्या
योग, पर आप से अच्छा कहा मिल पाएगा और दान की हुई चीज लौटाया नहीं जाता अतः हम गरीब पर अनुग्रह कर स्वीकार करे उसके उपरान्त सभी समाज के सामने श्री बाबा गणिनाथ जी का विवाह माता क्षेमा सती से हो जाता है। शादी के बाद बाबा गणिनाथ जी मा साह से विदा लेते हुए अपनी पत्नी क्षेमा शती से बोले हे शती तुम कुछ दिन और अपना माता पिता के पास रहो मुझे कुछ कार्य यस जाना है। पुनः लौट कर आऊँगा तो तुम्हें विदा करा कर ले चलूँगा ऐसा कह बाबा गणिनाथ वहाँ से चल पड़े। अब बाबा गणिनाथ जी गाँव से निकल जंगल के रास्ते से होते हुए गंगा किनारा जा एक स्थान पर
अपना चीमटा, कमण्डल और खाउ रख किनार पर उगे घास फूस साफ करने लगे और अपने मन में विचार किये यहाँ पर कुछ दिनों तक जम, तम, साधना करूंगा। उसी समय कुछ लोग अपने कनो पर अर्थी ले उसी ओर चले आ रहे थे तो गणिनाथ जी अपने मन में विचार किए मैं यहाँ तपो भूमि बनाने का सोचा था मगर ए लोग तो यहाँ असमसान बनायेगा। इतने में वे लोग अर्थी को कुछ ही दूरी पर रख दिया तो सन्त रूपी गणिनाथ जी उन लोगों से पूछे ऐ भाई यह कौन कादमी
और किसका लड़का है और कैसे दह मरा मुझे बताओ तब वहाँ आए लोगों में से एक व्यक्ति बोला है सन्त आप जिस जगह पर
बैठे हैं। उस जगह का नाम पलवैया नगरी है उन्हीं राज्य के जमीन्दार श्री धर्म साह जी हैं जो स्वयं दोनों आंखों से अन्धे है। एवं उन्हीं का एकलौता पुत्र जिसका नाम धीरज कुमार था उसी को कल रात्रि में काल बन एक नाम ने उस लिया और वो मर गया। हमलोगों ने बहुत जगह-जगह झाड़ फूक कराया गंगर कोई फायदा नहीं हुआ। तब गणिनाथ जी बोले है भाई अर्थी के अन्धन को खोलों वह बालक अब जगने ही बाला है वो बहुत देर तक मीठी नीन्द्र में सो चुका उस भीड़ से एक आदमी बड़े ही अभद्रता पूर्ण बोला ये कोई पागल आदमी है इसके बातों में समय बर्बाद न करें इन
लोगों को आज अन्य खाए तीसरा दिन बीत रहा है।
अतः जल्दी में क्रिया कर्म कर घर चले उसी भीड़ से एक वृद्ध व्यक्ति बोला ऐ भाई किसी सन्त के साथ ऐसा व्यवहार नहीं
करना चाहिए। कहा गया है जो न करे लकीर वो करे फकीर तो अर्थी तो मुझे खोलना ही पड़ेगा और खोलकर दिखा देंगे तो
हमारा क्या जाएगा।
इधर बाबा मन में विचार करने लगे जिस राज्य का राजा अन्धा हो और उसका एकलौता पुत्र मर गया हो उस राज्य में मै कैसे रहूँगा ऐसा सोच श्री बाबा जी ने अपने कमण्डल से गंगा जल एवं झोले से भस्म ले उस बालक के ऊपर छिड़क दिए तत्क्षण वह बालक उठ बैठा और श्री गणिनाथ जी को दण्डवत प्रणमा किया सभी लोग जय जयार करने लगे तब बाबा गणिनाथ जी उस बालक से बोले जाओ वत्स अपने घर जा अपने माता पिता का दर्शन करो कल्याण होगा वह लड़का दौड़ते हुए अपने घर को दौड़ चला और अपने घर पहुँच अपने पिता को आवाज दी उसके पिता ने अपने पुन की आवाज पहचान रोते-रोते चुप हो गया उसी समय वह धीरज नाम के लड़का अपने पिता के सीने से जा लगा तब उसके पिता ने पूछा तुम जिवीत कैसे हो गया तुम्हें तो सारे
लोग नदी में परमावति करने गए थे तो वह लड़का बोला अपने ही राज्य में एक महात्मा आए हैं उन्हीं के कृपा से हम जिवीत हुए।
तो धर्म साह अपने पुत्र को सीने से अलग करते हुए दोनों हाँथों को जोड़ वही मस्तक नीचा कर प्रणाम कर ज्योंही अपने
माथे को ऊपर उठाया तत्क्षण आँखों की ज्योति लौट गई और यह देखने लगा प्रथम उसने अपने पुत्र को देखा। देखिए हमारे नाथ जी की महीमा अब धर्म साह अपने पूरे समाज के साथ बाबा के दर्शन को सारे हर्शित हो जा पहुँचे गंगा किनारे पर जा बाबा के चरणों से लग अद्धा की आ"। बहाने लगे तब श्री गणिनाथ जी धर्म साह को सस्नेहपूर्ण आशिर्वाद दे बोले हे धर्म साह आप यहाँ आ गए सो बहुत ही अच्छा हुआ क्योंकि मैं तुम्हारे आज्ञा के बिना ही इस जगह पर अपना आसन लगा दिया था मुझे थोड़ी सी जगह नदी किनार पर चाहिए जहाँ एक छोटा सा कुटि बना तपस्या साधना करूंगा तो धर्म साह अति खुश हो बोला है प्रभु आज से ए पलवैया राज्य आपका ही है तो गणिनाथ जी बोले मूझे राज पाट से क्या लेना मुझे तो केवल एक कुटि भर जगह चाहिए पर धर्म साह नहीं माना और बोले दान किया चीज लौटता नहीं। अतः इसे स्वीकार करें तो बाबा बोले सारे राज्य को दान कर तुम कहां रहोगे तो धर्म साह बोला आपकी कृपा से मेरे दोनों नैन एवं मेरे पुत्र का जीवन दान मिला मैं अपने भाई के राज्य में सुखी पूर्वक अपना जीवन बीता लूँगा। तब गणिनाथ जी बोले आज
से इस नगरी का नाम तुम्हारे नाम से ही शुरू होगा।
इसलिए धर्म साह के नाम से धर्मपुर राज पलवैया इस जगह का नाम पड़ा जो आज भी इसी नाम से विख्यात है। जिसका रकवा साहरे बारह सौ बीघे की है जो वर्तमान में गंगा के गर्भ में है। कहीं बालु है तो कहीं जंगल और कहीं कहीं खेती भी होती है जो बाबा गणिनाथ जी के वंशज पन्छा पूजेरियों के अधिनस्थ है। अब कुछ दिनों तक तपस्या कर अपनी पत्नी को ला धर्मपुर राज पलवैया गंगा किनारे पर रहने लगे। अब धीरे-धीरे बाबा की महिमा की चर्चा होने लगी अब नाथ जी ग्राम वासियों को जंगली और वंजल भूमि को खेती योगबगाने का आदेश दिए। बाबी
उसी प्रकार कुछ समय बीतने पर गणिनाथ जी को दो पुत्र उत्पन्न लिए जिनका नाम क्रमश राय चन्द्र बाबा एवं शिवधर
पड़ा इन लोगों ने मृत भूवन में आ बड़े-बड़े दुश्दों एवं अन्नाईयों को परास्त कर समाज एवं देश की सेवा की।
समाप्त ।
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